Sugar Price Hike In India: चीनी के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी से देशभर में हड़कंप
नई दिल्ली, 23 अगस्त 2026। Sugar Price Hike In India- देश में चीनी की कीमतों में अचानक आई तेज बढ़ोतरी ने आम उपभोक्ताओं से लेकर मिठाई कारोबारियों और खाद्य उद्योग तक चिंता बढ़ा दी है। त्योहारी सीजन शुरू होने से ठीक पहले चीनी के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं। कई राज्यों में खुदरा कीमतें ₹60 प्रति किलोग्राम के पार निकल गई हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में कुछ बाजारों में भाव ₹70 किलो तक पहुंचने की खबर है। तमिलनाडु में भी चीनी का खुदरा भाव ₹67 किलो तक पहुंच गया है।
केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में औसत चीनी कीमत 20 जुलाई को ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। यानी करीब एक महीने में कीमत में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए बाजार में उपलब्धता बढ़ाने, जमाखोरी रोकने और त्योहारी सीजन में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कई कदम उठाए हैं।
क्यों बढ़ रही है चीनी की कीमत?
चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। सरकार के अनुसार, घरेलू चीनी उत्पादन अनुमान से कम रहने, गन्ने की फसल पर मौसम और बीमारियों के असर, त्योहारी मांग में वृद्धि, वैश्विक आपूर्ति में कमी तथा कुछ हिस्सों में जमाखोरी और सट्टेबाजी ने मिलकर बाजार पर दबाव बनाया है।
चालू चीनी सीजन में उत्पादन करीब 306 लाख टन (LMT) रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों ने शुरुआत में लगभग 343 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में उत्पादन करीब 37 लाख टन कम रहने की संभावना है। सरकार ने इसके लिए गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों तथा अत्यधिक बारिश के कारण हुए जलभराव को जिम्मेदार बताया है।
देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में मौसम की स्थिति ने भी उत्पादन को प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश के कई गन्ना उत्पादक जिलों में बारिश सामान्य से कम रही, जबकि महाराष्ट्र के कई इलाकों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई। कर्नाटक में इस वर्ष सामान्य से करीब 22 प्रतिशत कम बारिश दर्ज होने की बात सामने आई है।
महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक बढ़े दाम
महाराष्ट्र देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में है और कोल्हापुर देश के बड़े चीनी व्यापार केंद्रों में गिना जाता है। यहां 20 अगस्त को थोक चीनी की कीमत लगभग ₹5,750 प्रति क्विंटल दर्ज की गई।
तमिलनाडु में स्थिति और अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। चेन्नई सहित राज्य के कुछ बाजारों में चीनी का खुदरा भाव ₹67 प्रति किलो तक पहुंच गया है। स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, पिछले महीने करीब ₹45 किलो बिकने वाली चीनी के दाम में तेज उछाल आया है। व्यापारियों ने उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की कुछ मिलों द्वारा स्टॉक रोकने और अनियमित मानसून के कारण आपूर्ति प्रभावित होने को इसके पीछे प्रमुख वजह बताया है।
पश्चिम बंगाल में भी कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिला है। कोलकाता के बाजारों में चीनी का खुदरा भाव ₹70 किलो तक पहुंच गया। कारोबारियों के मुताबिक पिछले एक महीने में कीमत करीब ₹20 किलो बढ़ी है और पिछले चार-पांच दिनों में ही लगभग 10 प्रतिशत की अतिरिक्त तेजी आई। चीनी से जुड़े उत्पादों जैसे गुड़, बताशा और नकुलदाना के दाम भी बढ़ने की बात सामने आई है।
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई चिंता
सितंबर से नवंबर के बीच देश में गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं। इन त्योहारों के दौरान मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, पेय पदार्थों और अन्य खाद्य वस्तुओं में चीनी की मांग तेजी से बढ़ती है।
व्यापारियों का कहना है कि त्योहारी मांग को देखते हुए थोक खरीदार और कुछ कारोबारी अतिरिक्त स्टॉक रखने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बाजार में उपलब्ध तत्काल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। पश्चिम बंगाल के कारोबारियों ने भी आशंका जताई है कि अगर चीनी की थोक कीमतें ऊंची बनी रहीं तो मिठाई कारोबार की लागत बढ़ेगी और इसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
क्या इथेनॉल उत्पादन जिम्मेदार है?
चीनी कीमतों में तेजी के बीच सोशल मीडिया और बाजार में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 कार्यक्रम के कारण गन्ने का अधिक इस्तेमाल इथेनॉल के लिए किया जा रहा है और इसी वजह से चीनी की कमी पैदा हुई है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। सरकार के मुताबिक 2022-23 में कुल चीनी उत्पादन का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा इथेनॉल के लिए डायवर्ट किया गया था, जबकि 2025-26 में यह हिस्सा घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गया। सरकार ने यह भी कहा है कि देश में बनने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है।
इसलिए सरकार का कहना है कि मौजूदा चीनी महंगाई को केवल इथेनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं होगा। दूसरी ओर, कुछ व्यापारी और बाजार से जुड़े लोग इथेनॉल की मांग को भी आपूर्ति पर दबाव डालने वाले कारकों में गिन रहे हैं। ऐसे में इस मुद्दे पर सरकार और बाजार के अलग-अलग आकलन सामने आ रहे हैं।
सरकार ने उठाए बड़े कदम
कीमतों में तेजी को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने करीब एक दशक बाद बड़ा कदम उठाते हुए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और त्योहारी सीजन के दौरान संभावित कमी को रोकना है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर 2026 तक दी गई है।
इसके अलावा सरकार ने चीनी डीलरों के लिए 400 टन का स्टॉक लिमिट लागू किया है, जो 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा। 1 सितंबर से बड़े थोक उपभोक्ताओं को अपनी खपत के 15 दिनों से अधिक का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में स्टॉक का भौतिक सत्यापन भी कर रही हैं ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी की जांच की जा सके।
सरकार ने राज्यों और चीनी मिलों से 15 अक्टूबर से नया पेराई सीजन शुरू करने की सलाह भी दी है। सरकार का अनुमान है कि इससे अक्टूबर में चीनी उत्पादन सामान्य 3-4 लाख टन से बढ़कर 10 लाख टन से अधिक हो सकता है और त्योहारी सीजन में बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध हो सकेगी।
वैश्विक बाजार भी दे रहा है दबाव
चीनी की महंगाई केवल भारत तक सीमित नहीं है। सरकार के अनुसार 2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 33 लाख टन का संभावित घाटा रहने का अनुमान है। मौसम संबंधी चिंताओं ने भी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति के अनुमान को प्रभावित किया है।
30 जून 2026 को अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत लगभग $474 प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर करीब $552 प्रति टन हो गई—यानी दो महीने से भी कम समय में 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में है और घरेलू मांग लगभग 270-297 लाख टन के दायरे में रहती है।
क्या आने वाले दिनों में चीनी और महंगी होगी?
फिलहाल सरकार का दावा है कि देश में अक्टूबर में नए पेराई सीजन के शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक मौजूद है। लेकिन बाजार में कीमतों का मौजूदा दबाव और त्योहारी मांग यह तय करेगी कि अगले कुछ सप्ताह में कीमतें किस दिशा में जाती हैं।
10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन आयातित चीनी के भारत पहुंचने में समय लग सकता है। इसलिए इसका असर खुदरा कीमतों पर तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है। कोलकाता के कारोबारियों ने भी कहा है कि आयात की घोषणा के बावजूद अभी तक खुदरा बाजार में इसका प्रभाव पूरी तरह नहीं आया है।
फिलहाल देशभर में चीनी की कीमतों पर सरकार की नजर है। यदि जमाखोरी पर प्रभावी कार्रवाई होती है, आयातित चीनी समय पर बाजार में आती है और अक्टूबर से पेराई सीजन शुरू होता है, तो आपूर्ति में सुधार से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने के कारण आने वाले सप्ताह चीनी बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
निष्कर्षतः, चीनी की मौजूदा महंगाई किसी एक वजह का नतीजा नहीं बल्कि कम उत्पादन, मौसम की मार, सीमित स्टॉक, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार की स्थिति और कथित जमाखोरी जैसे कई कारकों का संयुक्त प्रभाव है। सरकार ने आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदम उठाकर कीमतों को काबू में करने की कोशिश शुरू कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन कदमों का असर आम उपभोक्ता की रसोई और मिठाई की दुकानों तक कितनी जल्दी पहुंचता है।

