Balaghat child deaths: बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत: 30 से अधिक मौतों के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
बालाघाट/भोपाल। Balaghat child deaths: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था, पोषण, स्वच्छ पेयजल और दूरदराज के गांवों तक चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिरसा ब्लॉक और आसपास के बैगा बहुल क्षेत्रों में पिछले कुछ महीनों के दौरान 30 से अधिक बच्चों की मौत की रिपोर्ट सामने आई है, जबकि सैकड़ों बच्चों के बीमार पड़ने और अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी सामने आ चुकी है।
हालांकि, इस पूरे मामले को किसी एक बीमारी या संक्रमण से हुई मौतों के रूप में देखना फिलहाल सही नहीं होगा। केंद्र की जांच में मृत बच्चों में अलग-अलग चिकित्सकीय कारण सामने आए हैं, जिनमें खसरा, मलेरिया, सह-संक्रमण, सांस लेने में गंभीर परेशानी, डिहाइड्रेशन, कुपोषण, एनीमिया और शॉक शामिल हैं। अधिकारियों के मुताबिक अब तक ऐसा कोई एक रोगजनक सामने नहीं आया है, जिसे सभी मौतों का एकमात्र कारण माना जा सके।
कैसे सामने आया पूरा मामला?
बालाघाट के घने जंगलों और दूरदराज के गांवों में रहने वाले बैगा समुदाय के बच्चों के बीमार पड़ने और मौतों की खबर अगस्त 2026 में प्रमुखता से सामने आने लगी। शुरुआत में इसे स्थानीय स्तर पर संक्रमण और स्वास्थ्य सुविधाओं की समस्या के तौर पर देखा गया, लेकिन जैसे-जैसे अस्पतालों में बीमार बच्चों की संख्या बढ़ी और अलग-अलग गांवों से मौतों की खबरें सामने आईं, मामला गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल गया।
सितंबर की शुरुआत तक रिपोर्टों में सामने आया कि करीब डेढ़ महीने के दौरान लगभग 400 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित गांवों में व्यापक स्वास्थ्य सर्वे शुरू किया।
ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कुंडेकासा, अडोरी, कोरका और बोंदारी गांवों में किए गए घर-घर स्वास्थ्य सर्वे के दौरान 10 सितंबर तक 6,342 लोगों की जांच की गई। इनमें 1,149 लोग विभिन्न बीमारियों से प्रभावित मिले। इनमें 663 मरीजों का इलाज घर पर किया गया, जबकि 486 को अस्पताल में भर्ती कराया गया। 446 मरीजों को इलाज के बाद छुट्टी दी जा चुकी थी, जबकि 40 लोग अभी भी उपचाराधीन थे।
बच्चों में कौन-कौन सी बीमारियां मिलीं?
स्वास्थ्य संकट के पीछे एक ही बीमारी होने की पुष्टि नहीं हुई है। जांच में मलेरिया, बुखार, त्वचा संबंधी बीमारी और रैश जैसी समस्याएं सामने आई हैं। कुछ मामलों में खसरा और अन्य संक्रमण भी पाए गए।
केंद्र की जांच के अनुसार कुछ बच्चों की स्थिति संक्रमण के साथ-साथ कुपोषण, एनीमिया, डिहाइड्रेशन और सांस संबंधी गंभीर समस्याओं के कारण बेहद खराब हुई। यही वजह है कि विशेषज्ञों और अधिकारियों के सामने चुनौती केवल संक्रमण को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि बच्चों की कमजोर पोषण स्थिति और स्वास्थ्य संबंधी अन्य जोखिमों को दूर करने की भी है।
कुपोषण ने बढ़ाई चिंता
इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू बच्चों में कुपोषण का स्तर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अगस्त में बिरसा ब्लॉक में पांच वर्ष से कम उम्र के 14,259 बच्चों का आकलन किया गया। इनमें 551 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण यानी Severe Acute Malnutrition (SAM) की श्रेणी में पाए गए, जबकि 1,948 बच्चे Moderate Acute Malnutrition की श्रेणी में थे। करीब 1,197 बच्चों को गंभीर रूप से कम वजन वाला दर्ज किया गया।
पूरे बालाघाट जिले में पांच वर्ष से कम उम्र के 1.21 लाख से अधिक बच्चों के आकलन में 3,741 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण और 15,588 बच्चे मध्यम तीव्र कुपोषण की श्रेणी में पाए गए। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर मौत सीधे कुपोषण के कारण हुई, लेकिन यह जरूर सामने आता है कि प्रभावित क्षेत्र के बच्चे संक्रमण से लड़ने के लिहाज से बेहद संवेदनशील स्थिति में हैं।
अस्पतालों पर बढ़ा दबाव
बीमार बच्चों की संख्या बढ़ने के साथ स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा। रिपोर्टों के मुताबिक सितंबर की शुरुआत में बालाघाट जिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 20 से 25 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे थे। बच्चों के लिए उपलब्ध करीब 50 बेड की क्षमता को बढ़ाकर लगभग 150 बेड तक किया गया।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रभावित गांवों का बड़ा हिस्सा दुर्गम और वन क्षेत्र में है, जहां किसी बीमार बच्चे को समय पर अस्पताल तक पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती है। ऐसे में बीमारी की शुरुआती पहचान और गांव स्तर पर उपचार की उपलब्धता बच्चों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पानी और पोषण व्यवस्था पर भी सवाल
मामला सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं है। प्रभावित गांवों में पेयजल और पोषण व्यवस्था को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में प्रभावित क्षेत्रों में पीले रंग का पानी आने वाले हैंडपंपों, अस्पतालों में भीड़ और बच्चों व महिलाओं को समय पर पौष्टिक भोजन नहीं मिलने जैसे आरोप लगाए गए। कोर्ट ने इन आरोपों पर राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है।
इसके अलावा, हाल में प्रभावित गांवों का दौरा करने वाले कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने एक आदिवासी स्कूल की स्थिति और पेयजल व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र की आशा कार्यकर्ताओं को छह महीने से भुगतान नहीं मिला है। ये दावे स्वतंत्र रूप से प्रशासनिक जांच से पुष्ट होने बाकी हैं, लेकिन उन्होंने क्षेत्र में स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान
बच्चों की मौत का मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। जबलपुर बेंच ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट कलेक्टर सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जनहित याचिका में बच्चों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने, अस्पतालों में क्षमता से अधिक मरीज होने, पेयजल की गुणवत्ता और पोषण व्यवस्था में कथित कमियों जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट की दखल के बाद अब प्रशासन के सामने केवल तत्काल चिकित्सा राहत पहुंचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट करना होगा कि प्रभावित इलाकों में बीमारी और मौतों की स्थिति इतनी गंभीर क्यों हुई और शुरुआती स्तर पर इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए थे।
प्रशासन ने क्या कदम उठाए?
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित इलाकों में घर-घर स्वास्थ्य जांच तेज की है। रिपोर्ट के मुताबिक 20 सर्वे टीमें, प्रधानमंत्री जनमन (PM-JANMAN) योजना के तहत छह मोबाइल मेडिकल यूनिट, 18 मेडिकल अधिकारी और चार एंबुलेंस इस अभियान में लगाए गए हैं।
करीब 21 हजार बच्चों को 458 टीकाकरण सत्रों के जरिए वैक्सीन दी गई है। 900 से अधिक बच्चों को विटामिन-A, ORS और जिंक दिया गया है, जबकि जरूरत के अनुसार बच्चों को आयरन सिरप और एल्बेंडाजोल भी दिया जा रहा है। मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावित गांवों में कीटनाशक छिड़काव और फॉगिंग भी बढ़ाई गई है।
राजनीतिक घमासान भी तेज
बच्चों की मौत को लेकर राजनीतिक विवाद भी बढ़ गया है। विपक्षी नेताओं ने स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल और प्रशासनिक निगरानी में कथित कमियों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने 15 सितंबर को बालाघाट जाकर मृत बच्चों के परिवारों से मिलने और स्थानीय मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराने का कार्यक्रम तय किया है।
वहीं, प्रभावित गांवों का दौरा कर चुके अभिजीत दिपके ने भी प्रशासन से जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। उनके दौरे के दौरान उन्हें राजनीतिकरण के आरोपों का सामना भी करना पड़ा।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या?
बालाघाट की त्रासदी का सबसे अहम सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चों की मौत किस बीमारी से हुई। बड़ा सवाल यह है कि क्या समय रहते बीमारी की पहचान, पोषण की निगरानी, स्वच्छ पानी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं इन दूरदराज के परिवारों तक पर्याप्त रूप से पहुंच पाईं?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य जांच और इलाज शुरू हो चुका है। कई मरीज ठीक होकर घर भी लौट चुके हैं। लेकिन एक महीने से अधिक समय बाद भी बीमार बच्चों का अस्पताल पहुंचना जारी रहना बताता है कि संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
सबसे जरूरी बात यह है कि 30 से अधिक बच्चों की मौत को केवल एक संक्रामक बीमारी के आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह घटना आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, कुपोषण, स्वच्छ पेयजल, टीकाकरण, प्राथमिक चिकित्सा और सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की व्यापक तस्वीर सामने रखती है।
फिलहाल जांच और न्यायिक प्रक्रिया जारी है। बच्चों की मौतों की अंतिम जिम्मेदारी और प्रत्येक मृत्यु का चिकित्सकीय कारण संबंधित जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए प्राथमिकता साफ है—बीमार बच्चों को समय पर इलाज मिले और ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।

